Sanju Manthan

स्वार्थ क्या है ्््््््

संजू मंथन
स्वार्थ क्या है ्््््््
अपना कौन ््््््््
मानव इस भौतिक जगत में संपूर्ण जीवन काल में कर्म करते हुए मृत्यु के गोद में जा बैठता है और अधिकांश जीवन काल के अंत में यह कहते सुने गए हैं की पूरा जीवन व्यर्थ गया तो यह प्रश्न उठता है की जीवन का सार्थक स्वरूप क्या है जीवन की संपूर्णता क्या है
एक महत्वपूर्ण शब्द है स्वार्थ अर्थात स्व हित दूसरे शब्दों में अपना हित अपना हित क्या है कितने क्षण कितने पल हमारा है इसके बारे में क्या कुछ कहा जा सकता है क्या कुछ जीवन में निश्चित है निश्चित सिर्फ जन्म हुआ है तो मृत्यु होगा यही निश्चित है इसके मध्य में क्या होगा सब कुछ अनिश्चित है जीवन और मृत्यु के मध्य जो गैप है दूरी है उसे पूरा तो होना ही है
मानव जीवन भर स्व हित के लिए कर्म  करता है क्या उसका हित हो जाता है वह संतुष्ट हो जाता है उसका जीवन सार्थक और संपूर्ण हो जाता है एक प्रश्न चिन्ह है जिसे वह अपना मानता है यह मेरा है क्या वह अपना होता है जिसमें सारे रिश्ते नाते परिवार यहां तक इंसान का जीवन अपना है यह भी एक प्रश्न है
जीवन मिला है तो जीना भी पड़ेगा तो कैसे जिसमें जीवन सार्थक हो संपूर्ण हो कर्म क्षेत्र है तो करम करना ही पड़ेगा अपना कौन है स्वार्थ क्या है अपना हित किसमे है यह भी अनुसंधान रिसर्च खोज तलाश का विषय है जिसने इस रहस्य को जान लिया तो जीवन सार्थक हो जाता है एक नदी है जिसका कर्म है प्रवाहित होना निरंतर प्रवाहित होना एक वृक्ष है जिसका कर्म है फल प्रदान करना यदि मानव प्रकृति से शिक्षा ले तो शायद जीवन सार्थक और संपूर्ण हो सकता है शायद अब समझ में आ रहा होगा की अपना क्या है स्व हित किसमे है हमारे हाथ में हमारे अधिकार में सिर्फ कर्म करना है इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है यही सार्थक और संपूर्ण जीवन है

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